MP Board Class 12th Special Hindi Sahayak Vachan Solutions Chapter 1 उत्तराखंड की यात्रा

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MP Board Class 12th Special Hindi सहायक वाचन Solutions Chapter 1 उत्तराखंड की यात्रा (यात्रा, सेठ गोविन्द दास)

उत्तराखंड की यात्रा अभ्यास प्रश्न

प्रश्न 1.
उत्तराखंड के अन्तर्गत कौन-कौन से तीर्थ हैं? उत्तराखंड की यात्रा में शारीरिक कष्ट के विपरीत किस प्रकार का आनंद मिलता है और क्यों?
उत्तर:
उत्तराखंड के अन्तर्गत हिन्दुओं के पवित्र चार धाम तीर्थ-यमुनोत्तरी, गंगोत्तरी, केदारनाथ एवं बद्रीनाथ हैं। उत्तराखंड की यात्रा अत्यन्त दुर्गम एवं शारीरिक कष्ट प्रदान करने वाली है, किन्तु इसके विपरीत उत्तराखंड के प्राकृतिक सौन्दर्य से परिपूर्ण दश्य एवं धार्मिक महानता एक विशिष्ट प्रकार का मानसिक आनन्द प्रदान करती है, जिससे मार्ग अथवा यात्रा के कष्टों की तीव्रता क्षीण-सी हो जाती है।

प्रश्न 2.
उत्तराखंड के चारों धाम किन चार पवित्र नदियों के किनारे स्थित हैं? (2009, 13, 15, 17)
उत्तर:
उत्तराखंड के सुप्रसिद्ध चार धाम पवित्र नदियों के तट पर स्थित हैं। यमुनोत्तरी का मार्ग यमुना नदी के किनारे-किनारे,गंगोत्तरी का मार्ग गंगा नदी के किनारे-किनारे, केदारनाथ का मार्ग मन्दाकिनी के किनारे-किनारे तथा बद्रीनाथ का मार्ग अलकनन्दा नामक पवित्र नदी के किनारे-किनारे गया है।

प्रश्न 3.
उत्तराखंड के प्राकृतिक दृश्य श्रद्धालुओं को क्यों आकर्षित करते हैं?
उत्तर:
उत्तराखंड के प्राकृतिक दृश्यों के सौन्दर्य के सामने न तो काश्मीर के दृश्य ठहरते हैं और न ही स्विट्जरलैण्ड के। स्वच्छ जल समेटे कल-कल करती पवित्र नदियाँ, वर्ष भर बर्फ से आच्छादित रहने वाली पर्वत-चोटियाँ, हरे-भरे वृक्षों से भरे घने जंगल, चारों ओर फैली हरियाली, घाटी की मनोहारी वादियाँ, चीड़ और देवदारु के ऊँचे-ऊँचे वृक्ष, गगनचुम्बी ऊँचाई से गिरते जल-प्रपात और शान्त-मनोरम वातावरण, सब कुछ ऐसा लगता है मानो किसी दूसरे लोक में आ गये हों। यही कारण है कि इस प्रदेश की यात्रा के कष्टकारक होने के बाद भी श्रद्धालु उत्तराखंड के प्राकृतिक दृश्यों के प्रति अत्यधिक आकर्षित हो, अपूर्व मानसिक आनन्द प्राप्त करते हैं।

प्रश्न 4.
ज्योतिर्मठ के विषय में संक्षिप्त जानकारी लिखिए।
उत्तर:
आज भी उत्तराखंड में शंकराचार्य जी के कार्यों एवं उनके निवास स्थान के प्रत्यक्ष दर्शन किये जा सकते हैं । ज्योतिर्मठ में आज भी वह शहतूत का वृक्ष है, जिसके नीचे बैठकर तपोभूत शंकराचार्य जी को ज्योति के दर्शन हुए। इस स्थान के निकट ही उनकी वह शंकर गुफा भी देखी जा सकती है, जिसमें वे निवास किया करते थे। इसी वृक्ष के नीचे भगवान शंकराचार्य ने तत्त्वज्ञान के महान् ग्रन्थ ‘शांकर भाष्य’ की रचना की थी। ज्योतिर्मठ का सेब, नाशपाती, अखरोट आदि फलों से लदे पौधों का बगीचा, संस्कृत का विद्यालय, आज भी जगत् गुरु शंकराचार्य जी के पवित्र प्रयलों और संकल्पों को दुहरा रहा है, जिसके दर्शन मात्र से संसार ने महान् प्रेरणा पाई थी।

प्रश्न 5.
“हमारे ऋषि-मुनियों ने तपोवनों में भारत की एकता पर चिंतन किया है।” समझाइए।
उत्तर:
हमारे ऋषि-मुनियों ने गाँव-शहर के कोलाहल और आकर्षण से दूर तपोवनों में एकान्त साधना द्वारा सदैव भारत की जो एकता तथा हित की चिन्ता की है, वह उनके कार्यों द्वारा सिद्ध हो जाती है। उपर्युक्त कथन की पुष्टि के लिए मात्र यह उदाहरण पर्याप्त होगा। भारत के उत्तर में स्थित चार धाम में से दो देव मन्दिरों-केदारनाथ और बद्रीनाथ के पुजारी,जिन्हें ‘रावल’ कहा जाता है, उत्तर के न होकर केदारनाथ के कर्नाटक से और बद्रीनाथ के केरल से आते हैं। आज तक उनके द्वारा निर्धारित की गई पूजा-पद्धति और नियम का पूर्णतया पालन हो रहा है। भारत को एकता के सूत्र में बाँध कर रखने की भावना का इससे अच्छा भला क्या उदाहरण होगा?

प्रश्न 6.
लेखक ने उत्तराखंड के प्राकृतिक संसाधनों के बारे में क्या लिखा है? अपने शब्दों में वर्णन कीजिए।
उत्तर:
लेखक के अनुसार उत्तराखंड में शक्ति और ऊर्जा के अपार स्रोतों के साथ-साथ विशाल प्राकृतिक संसाधन मौजूद हैं। जीवन के मूल आधार ‘जल’ की इतनी प्रचुरता एवं शुद्धता में उपस्थिति. इस प्रदेश को दनिया के अन्य किसी भी स्थान से अलग करती है। इस प्रमुख प्राकृतिक संसाधन का उपयोग कृषि कार्यों,बिजली उत्पादन इत्यादि में और प्रभावी और विशाल स्तर पर किया जा सकता है। उत्तराखंड के विशाल भू-भाग में फैले घने जंगल, अपने आप में बहुउपयोगी वृक्षों को समेटे हुए हैं।

विविध प्रकार के इन वृक्षों से प्राप्त होने वाली विभिन्न वस्तुओं का उपयोग भी जन-हित एवं देश-हित में किया जा सकता है। विशाल पर्वतों के अन्दर मौजूद खनिज पदार्थों के अक्षय भण्डारों को खोजने एवं उन्हें बाहर निकालने की दिशा में प्रयास होने चाहिए, जिससे उनका व्यावसायिक रूप से उपयोग कर इस प्रदेश के विकास में योगदान दिया जा सके। पशु-पालन एवं वन आधारित कुटीर उद्योगों से सम्बन्धित परियोजनाओं को बनाने एवं उन्हें सफलतापूर्वक लागू करवाने की दिशा में प्रयास होने चाहिए। अन्ततः, यह कहा जा सकता है कि प्राकृतिक संसाधनों की दृष्टि से उत्तराखंड एक सम्पन्न प्रदेश है।

प्रश्न 7.
इस यात्रा-वृत्तांत को पढ़कर आपके मन में कौन-कौन-सी प्रेरणाएँ जागती हैं? लिखिए।
उत्तर:
उत्तराखंड से सम्बन्धित इस यात्रा-वर्णन को पढ़कर सर्वप्रथम उत्तराखंड के शीघ्र-से-शीघ्र भ्रमण की भावना जाग्रत होती है। इस यात्रा वृत्तांत में वर्णित स्थानों,वस्तुओं इत्यादि को जीवंत देखना एवं उनकी उपस्थिति को अनुभव करना,इन सबके सोचने मात्र से ही रोमांच का अनुभव होता है। उत्तराखंड की देवभूमि, जहाँ हमें प्रकृति से तालमेल बनाकर, प्रकृति-प्रदत्त संसाधनों का जन-हित में उपयोग करने की प्रेरणा देती है, वहीं यह हमारी महान् धार्मिक एवं सांस्कृतिक विरासत पर अभिमान करने,किन्तु उसके संरक्षण के लिए भी प्रेरित करती है। यह हमें हमारे उस सुन्दर अतीत में झाँकने का अवसर प्रदान करती है,जब हमारे महान् संत-महात्माओं, तपस्वियों एवं विभूतियों ने निःस्वार्थ सेवा-भाव से अनूठे कार्य सम्पादित किये थे।

उत्तराखंड की यात्रा अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
केदारनाथ की हिमानी पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
केदारनाथ स्थित हिमानी की शोभा अवर्णनीय है। इस हिमानी की ऊँचाई लगभग तेइस हजार फुट है। इस प्रकार की इतनी विशाल, भव्य और ऊँची हिमानी संभवतया विश्व में कहीं और नहीं है।

प्रश्न 2.
लेखक सेठ गोविन्दास के अनुसार धर्म के विकास का एक बहुत बड़ा साधन क्या है?
उत्तर:
लेखक सेठ गोविन्द दास के अनुसार सगुणोपासना और मन्दिरों की मूर्तियाँ धर्म के विकास का एक बहुत बड़ा साधन हैं।

उत्तराखंड की यात्रा पाठ का सारांश

‘सेठ गोविन्द दास’ द्वारा लिखित प्रस्तुत यात्रा वर्णन ‘उत्तराखंड की यात्रा’ में उत्तराखंड की प्राकृतिक एवं सांस्कृतिक धरोहर का मनोहारी चित्र अंकित किया गया है।

लेखक के अनुसार, भारत के उत्तर भाग में स्थित उत्तराखंड राज्य को सदियों से ‘देवभूमि’ का स्थान प्राप्त है। हिन्दुओं के सुप्रसिद्ध एवं पवित्र चार धाम तीर्थ-यमुनोत्तरी, गंगोत्तरी, केदारनाथ एवं बद्रीनाथ यहीं पर स्थित हैं। यद्यपि इन तीर्थों तक की यात्रा अत्यन्त दुर्गम एवं कष्टकारी है, किन्तु यहाँ का प्राकृतिक सौन्दर्य एवं धार्मिक महानता सहज ही यात्री को मानसिक आनन्द से भर देती है।

उत्तराखण्ड के चारों धाम,चार पवित्र नदियों-यमुना, गंगा,मन्दाकिनी एवं अलकनन्दा के तट पर स्थित हैं। वर्ष-भर बर्फ से ढंकी ऊँची-ऊँची पर्वत चोटियाँ, चीड़, देवदारु इत्यादि वृक्षों से भरे घने जंगल, ऊँचे-ऊँचे पर्वत-शिखरों से गिरते असंख्य झरने, इस प्रदेश की शोभा को स्वर्ग-सरीखा बनाते हैं।

केदारनाथ एवं बद्रीनाथ के मन्दिरों में वैदिक मंत्रोच्चार के साथ होने वाले धार्मिक अनुष्ठान और विधि-विधान से पूर्ण पूजा-अर्चना, एक विशिष्ट एवं आकर्षक सांस्कृतिक एवं धार्मिक वायुमण्डल का निर्माण करते हैं। महर्षि वेदव्यास और शंकराचार्य आदि की कर्मस्थली रहा यह भू-भाग, आज भी समस्त संसार को प्रेरित-सा करता प्रतीत होता है।

प्राकृतिक सौन्दर्य से भरा-पूरा यह प्रदेश आध्यात्मिक प्रेरक के साथ-साथ औद्योगिक एवं विकास की दृष्टि से भी स्वयं में अपार सम्भावनाएँ समेटे हुए हैं। आवश्यकता मात्र इस बात की है कि इस प्रदेश के भौगोलिक एवं प्राकृतिक स्रोतों का सुनियोजित तरीके से प्रभावी उपयोग प्रदेश-हित एवं देश-हित में किया जाये।

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