MP Board Class 12th Special Hindi पद्य साहित्य का विकास : आधुनिक काव्य प्रवृत्तियाँ

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आधुनिक काल

आधुनिक हिन्दी कविता का प्रारम्भ संवत् 1900 से माना जाता है। यह काल अनेक दृष्टियों से महत्त्वपूर्ण है। इस काल में हिन्दी साहित्य का चहुंमुखी विकास हुआ। इस काल में सांस्कृतिक,राजनीतिक एवं सामाजिक आन्दोलनों के फलस्वरूप हिन्दी काव्य में नई चेतना तथा विचारों ने जन्म लिया और साहित्य बहुआयामी क्षेत्रों को सस्पर्श करने लगा। इस काल में धर्म, दर्शन,कला एवं साहित्य,सभी के प्रति नये दृष्टिकोण का आविर्भाव हुआ।

आधुनिक हिन्दी कविता के विकासक्रम को विभिन्न विद्वानों ने अनेक प्रकार से वर्गीकृत किया है किन्तु सर्वमान्य रूप से इस विकास को निम्नलिखित भागों में बाँटा जा सकता-
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है भारतेन्दु युग हिन्दी कविता का जागरण काल है। इस युग को हिन्दी साहित्य का प्रवेश द्वार माना जाता है। इस युग में देशोद्धार, राष्ट्र – प्रेम, अतीत – गरिमा आदि विषयों की ओर ध्यान दिया गया और कवियों की वाणी में राष्ट्रीयता का स्वर निनादित होने लगा। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, प्रताप नारायण मिश्र, चौधरी बद्रीनारायण प्रेमघन’, लाला सीताराम आदि प्रमुख रचनाकार हुए।
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द्विवेदी युग में खड़ी बोली कविता की सम्वाहिका बनी। काव्य में सामाजिक तथा पौराणिक विषयों का विस्तार हुआ। श्रीधर पाठक, आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी, अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’, मैथिलीशरण गुप्त, गयाप्रसाद शुक्ल ‘सनेही’,रामचरित उपाध्याय, रामनरेश

त्रिपाठी, गोपालशरण सिंह, जगन्नाथ प्रसाद ‘रत्नाकर’, सत्यनारायण ‘कविरत्न’ आदि विशेष उल्लेखनीय हैं।
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हिन्दी काव्य की प्रमुख प्रवृत्तियाँ

1. छायावाद [1920 – 19361]

हिन्दी कविता में आधुनिकता तथा नवीन युग के सूत्रपात का श्रेय छायावादी युग को प्रदान किया जाता है।

हिन्दी साहित्य में छायावाद द्विवेदीयुगीन काव्य प्रवृत्ति की प्रतिक्रिया की उपज है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के अनुसार, “छायावाद शब्द का प्रयोग दो अर्थों में है—एक तो कवि उस अनन्त अज्ञात प्रियतम को आलम्बन बनाकर चित्रमयी भाषा में प्रेम के अनेक प्रकार की व्यंजना करता है। दूसरा प्रयोग काव्य – शैली या पद्धति – विशेष के व्यापक अर्थ में है।”

डॉ. रामकुमार वर्मा के अनुसार, “परमात्मा की छाया आत्मा में पड़ने लगती है और आत्मा की छाया परमात्मा में,यही छायावाद है।”

डॉ. नगेन्द्र ने छायावाद को “स्थूल के प्रति सूक्ष्म का विद्रोह”माना है।

आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी के अनुसार, “मानस अथवा प्रकृति के सूक्ष्म किन्तु व्यक्त सौन्दर्य में आध्यात्मिक छाया का भाव ही छायावाद है।”

  • छायावाद की प्रमुख प्रवृत्तियाँ

छायावादी काव्य में पायी जाने वाली प्रवृत्तियों को हम मुख्यतः तीन वर्गों में विभक्त कर सकते हैं—
(क) विषयगत, (ख) विचारगत और (ग) शैलीगत।

(क) विषयगत प्रवृत्तियाँ
इसके अन्तर्गत तीन प्रकार की अभिव्यंजना है –
(1) नारी सौन्दर्य और प्रेम – चित्रण,
(2) प्रकृति – सौन्दर्य और प्रेम – व्यंजना तथा
(3) अलौकिक प्रेम या रहस्यवाद।

(1) नारी सौन्दर्य और प्रेम – चित्रण छायावादी कवियों ने सौन्दर्य के स्थूल चित्रण की अपेक्षा उसके सूक्ष्म प्रभाव का अंकन किया है। प्रेम के क्षेत्र में वे किसी रूढ़ि, मर्यादा या नियमबद्धता को स्वीकार नहीं करते। दारले 3 इनके प्रेम की दूसरी विशेषता है – वैयक्तिकता। हिन्दी में पहले भी श्रृंगारी कवियों ने प्रेम – वर्णन किया, किन्तु प्रेममार्गी कवियों को छोड़कर सभी ने राधा, पद्मिनी,उर्मिला,यशोधरा को माध्यम बनाया, जबकि छायावादी कवियों ने निजी प्रेमानुभूतियों की व्यंजना की। उनका प्रेम सूक्ष्म है। इन्होंने श्रृंगार के स्थूल क्रिया – कलापों के बजाय सूक्ष्म भाव दशाओं का उद्घाटन किया। चौथी विशेषता है कि उनकी प्रणय – गाथा का अन्त असफलता एवं निराशा में होता है। प्रेम – निरूपण में सबसे अधिक सफलता विरह – अनुभूति के वर्णन में मिली है।

(2) प्रकृति – सौन्दर्य और प्रेम – व्यंजना प्रकृति के सौन्दर्य और प्रेम का वर्णन भी छायावादी कवियों की श्रृंगारिकता का दूसरा रूप है। वे प्रकृति में नारी और प्रेयसी दोनों की छवि और सौन्दर्य देखते हैं। पत्तों और फूलों की मर्मर, भ्रमरों की गुनगुन में उन्हें पायल की झंकार या मधुर आलाप सुनायी देता है। उन्होंने प्रकृति को सचेतन मानकर (उसका) मानवीकरण और नारीकरण किया है।

(3) अलौकिक प्रेम या रहस्यवाद – ‘प्रेम पथिक’ और ‘आँसू’ में प्रसादजी ने सबसे पहले अलौकिक प्रेम की अभिव्यक्ति की थी। रहस्यवाद में पहले वियोग, फिर संयोग होता है। छायावाद में इसके विपरीत है।

(ख) विचारगत प्रवृत्तियाँ छायावाद की विचारगत प्रवृत्तियाँ निम्नलिखित हैं

(1) दर्शन के क्षेत्र में अद्वैतवाद एवं सर्वात्मवाद।
(2) धर्म के क्षेत्र में रूढ़ियों एवं बाह्याचारों से मुक्त व्यापक मानव – हितचिन्तन।
(3) समाज के क्षेत्र में समन्वयवाद।
(4) राजनीति के क्षेत्र में अन्तर्राष्टीय एवं विश्व – शान्ति का समर्थन।
(5) पारिवारिक एवं दाम्पत्य जीवन के क्षेत्र में हृदयतत्व की प्रधानता।
(6) साहित्य के क्षेत्र में व्यापक कलावाद या सौन्दर्यवाद।

(ग) शैलीगत प्रवृत्तियाँ
छायावादी शैली की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं
(1) मुक्तक गीत शैली।
(2) प्रतीकात्मकता।
(3) प्राचीन एवं नवीन अलंकारों का प्रचुर मात्रा में सफल प्रयोग।
(4) कोमलकांत संस्कृतनिष्ठ पदावली।
(5) गीति शैली के सभी प्रमुख तत्व – वैयक्तिकता, भावात्मकता, संगीतात्मकता, संक्षिप्तता और कोमलता।

  • छायावाद के प्रमुख कवि एवं उनकी रचनाएँ

छायावाद के चार प्रमुख स्तम्भ हैं
1. जयशंकर प्रसाद,
2. सुमित्रानन्दन पन्त,
3. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’,
4. महादेवी वर्मा।

(1) जयशंकर प्रसाद प्रसाद ने प्रारम्भ में ब्रजभाषा में कविताएँ लिखीं। 1913 – 14 में वे खड़ी बोली में कविता करने लगे। उनके प्रमुख काव्य ग्रन्थ हैं – ‘चित्राधार’, ‘प्रेम पथिक’, ‘करुणालय’, ‘महाराणा का महत्व’, ‘कानन कुसुम’, ‘झरना’, ‘आँसू’, लहर’ और ‘कामायनी’। ‘कामायनी’ उनकी अन्तिम काव्य – रचना है। यह महाकाव्य है। ‘प्रेम पथिक’ लघु प्रबन्ध – काव्य है। ‘आँसू’ खण्ड – काव्य है, विरह – काव्य है। ‘कानन कुसुम’, झरना’, लहर स्फुट’ कविताओं के संग्रह हैं।

प्रसादजी छायावाद के प्रौढ़तम श्रेष्ठ कवि हैं।

(2) सुमित्रानन्दन पन्त—’वीणा’,’ग्रन्थि’, पल्लव’, ‘गुंजन’, ‘युगान्त’,’युगवाणी’, ‘ग्राम्या’, ‘स्वर्ण धूलि’, ‘युगान्तर’, ‘उत्तरा’, ‘रजतशिखर’,’शिल्पी’, ‘अतिमा’, ‘वीणा’ पन्त की काव्य – कृतियाँ हैं। पल्लव’, ‘गुंजन’ में उनकी स्फुट रचनाएँ हैं। ‘वीणा’ में रहस्यवाद का प्रभाव है। ‘पल्लव’ में निराशा और प्रकृति – चित्रण की तथा ‘गुंजन’ में नारी सौन्दर्य एवं मानववाद की प्रवृत्ति दृष्टव्य है। ‘ग्रन्थि’ एक छोटा प्रबन्ध – काव्य है जिसमें असफल प्रेम की कहानी है। ‘युगान्त’ में छायावादी युग का अन्त हो जाता है।

(3) सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ – ‘परिमल’, ‘अनामिका’, ‘तुलसीदास’, ‘कुकुरमुत्ता’, ‘अणिमा’,’बेला’, ‘नये पत्ते’, ‘अर्चना’, ‘आराधना’ निरालाजी की रचनाएँ हैं। इनकी रचनाओं में छायावाद की सभी प्रवृत्तियाँ हैं। कहीं रहस्यवाद भी है। बाद में निरालाजी प्रगतिवादी हो गये।

(4) महादेवी वर्मा – ‘नीहार’, ‘रश्मि’, ‘नीरजा’, ‘सांध्यगीत’ और ‘दीपशिखा’ महादेवीजी की काव्य – रचनाएँ हैं। इन चार प्रमुख कवियों के अतिरिक्त मुकुटधर पाण्डेय, भगवतीचरण वर्मा, रामकुमार वर्मा, नरेन्द्र शर्मा, रामेश्वर शुक्ल ‘अंचल’, मोहनलाल महतो ‘वियोगी’, जानकीबल्लभ शास्त्री भी छायावाद के कवि हैं।
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2. रहस्यवाद
[काल निर्धारण कठिन]

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के शब्दों में, “चिन्तन के क्षेत्र में जो अद्वैतवाद है वही भावना के क्षेत्र में रहस्यवाद है।”

बाबू गुलाबराय ने “प्रकृति में मानवीय भावों का आरोप कर जड़ – चेतन के एकीकरण की प्रवृत्ति के लाक्षणिक प्रयोगों को रहस्यवाद कहा है।”

मकटधर पाण्डेय के अनुसार, “प्रकृति में सूक्ष्म सत्ता का दर्शन ही रहस्यवाद है।”

रहस्यवाद का अर्थ है – छिपी हुई बात’। अतः रहस्यवाद का अर्थ हुआ वह विचारधारा या वाद जिसका आधार अज्ञात है। हिन्दी कविता में रहस्यवाद का काल निर्धारण करना कठिन है क्योंकि रहस्यवाद सृष्टि के आरम्भ से ही कवियों को प्रिय रहा है।

रहस्यवाद के तीन प्रमुख लक्षण हैं –
(1) अद्वैतवादी विचारधारा की स्वीकृति – आत्मा और परमात्मा एक हैं, अभिन्न हैं।
(2) उस असीम शक्ति से रागात्मक सम्बन्ध की अनुभूति।
(3) भाषा के माध्यम से अनुभूतियों की अभिव्यक्ति। सर्वप्रथम रहस्यवादी कवि कबीर और जायसी माने गये हैं।

आधुनिक युग में रहस्यवादी कवियों में जयशंकर प्रसाद सर्वप्रथम हैं। फिर निरालाजी ने तुंग हिमालय श्रृंग मैं चंचलगति सुर – सरिता” कहकर अलौकिक के साथ अपना स्पष्ट सम्बन्ध जोड़ लिया। पन्तजी भी प्रारम्भ में रहस्यवादी रहे।

रहस्यवाद की साधना में अकेली महादेवी वर्मा विरह के गीत ही गाती रहीं।

  • रहस्यवाद की प्रमुख प्रवृत्तियाँ

(1) अद्वैतवादी मान्यता,
(2) दाम्पत्य – प्रेम पद्धति,
(3) प्रेम में स्वच्छता एवं पवित्रता,
(4) दैन्य एवं आत्म – समर्पण की भावना,
(5) प्रतीकात्मकता,
(6) मुक्तक गीति शैली।

  • रहस्यवाद के प्रमुख कवि

कबीर, प्रसाद, पन्त, निराला, महादेवी सभी ने इस शैली को अपनाया है। ये सभी रहस्यवादी हैं। रामकुमार वर्मा आदि कवि अंशतया रहस्यवाद के कुछ सोपानों पर चढ़ सके. इसलिए उनकी रचनाओं में कुछ स्थानों पर रहस्यवाद की झलक मिलती है।

3. प्रगतिवाद
[1936 – 19431]

“राजनीति के क्षेत्र में जो साम्यवाद है, वह काव्य के क्षेत्र में प्रगतिवाद है।”

प्रगतिवादी काव्य की संज्ञा उस कविता को प्रदान की गई जो कि छायावाद के समापन काल में सन् 1936 के आस – पास सामाजिक चेतना को लेकर अग्रसर हुआ। प्रगतिवादी कविता में राजनैतिक, आर्थिक और सामाजिक शोषण से मुक्ति का स्वर प्रमुख है। इस कविता पर मार्क्सवाद का प्रभाव है। रूस के नये संविधान और सन् 1905 में लखनऊ में भारतीय प्रगतिशील लेखक संघ की प्रेमचन्द की अध्यक्षता में हुई सभा इसके विकास – क्रम के महत्वपूर्ण सोपान हैं। प्रगति शब्द का अर्थ है – चलना, आगे – बढ़ना, अर्थात् यह वह वाद है जो आगे बढ़ने में विश्वास रखता है। प्रगतिवाद में साम्यवाद दृष्टिकोण को साहित्यिक विचारधारा के रूप में स्वीकार किया गया है।

  • प्रगतिवाद की प्रमुख प्रवृत्तियाँ

“दर्शन में जिसे द्वन्द्वात्मक भौतिक विकासवाद माना गया है, राजनीति में जो साम्यवाद है, वही साहित्य में प्रगतिवाद है।”
(1) धर्म,ईश्वर एवं परलोक का विरोध है। समाज में वर्ग – संघर्ष को समाप्त करने के लिए भाग्यवादिता की मान्यता को नष्ट करना होगा, क्योंकि शोषक वर्ग केवल भाग्य के बल पर ही शोषण करता है।
(2) पूँजीपति वर्ग के प्रति घृणा का प्रचार प्रगतिवादी कलाकारों ने किया है।
(3) शोषित वर्ग की दीन – हीन दशा का यथार्थ चित्रण करके ही दोनों वर्गों का भेद स्पष्ट किया है।
(4) नारी के प्रति यथार्थवादी दृष्टिकोण अपनाया गया है। उसे रूपसी, नायिका या राज – वैभव में पलने वाली राजदुलारी नहीं, वरन् मजदूरी करने वाली कृषक ललना के रूप में चित्रित किया है।
(5) सरल शैली को अपनाकर अपनी रचनाओं को जन – साधारण तक पहुँचाना ही इस प्रवृत्ति का उद्देश्य रहा है।

  • प्रगतिवाद के प्रमुख कवि एवं उनकी रचनाएँ

निराला, सुमित्रानन्दन पन्त, नरेन्द्र शर्मा, भगवतीचरण वर्मा के अतिरिक्त आधुनिक कवियों में सबसे अग्रणी नाम रामधारीसिंह ‘दिनकर’ का है। इनके बाद बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’, शिवमंगल सिंह ‘सुमन’, रामेश्वर शुक्ल ‘अंचल’, नागार्जुन, त्रिलोचन, केदारनाथसिंह, केदारनाथ अग्रवाल, शमशेर बहादुर सिंह आदि प्रगतिवादी कवि हुए।
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4. प्रयोगवाद
[1943 – 1950]

सन् 1943 में सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ के नेतृत्व में हिन्दी में एक आन्दोलनकारी लहर उठी,जो ‘प्रयोगवाद’ कहलायी। इसकी भूमिका में अज्ञेय ने लिखा है, “ये कवि नवीन राहों के अन्वेषी हैं।”
इस प्रयोगवाद नामक विचारधारा पर यूरोप के अनेक आधुनिक काव्य सम्प्रदायों का प्रभाव है, जिसमें
(1) प्रतीकवाद, बिम्बवाद,
(2) अति यथार्थवाद,
(3) अस्तित्ववाद,
(4) फ्राइडवाद आदि मुख्य हैं।

  • प्रयोगवाद की मुख्य प्रवृत्तियाँ

(1) घोर व्यक्तिवाद – नयी कविता का प्रमुख लक्ष्य निजी मान्यताओं, विचारधाराओं और अनुभूतियों का प्रकाशन है। वस्तुतः इन कविताओं में व्यष्टिवाद को अभिव्यक्ति प्रदान की गयी है
(2) दूषित वृत्तियों का यथार्थ (एवं) नग्न रूप में चित्रण – जिन वृत्तियों को पहले साहित्य में अश्लील,असामाजिक एवं अस्वस्थ समझा जाता था,उन्हीं कुण्ठाओं और वासनाओं का वर्णन प्रयोगवादी कविता में मिलता है।
(3) निराशावादिता – इस धारा के कवि भूत – भविष्य की प्रेरणा और चिन्ता से मुक्त होकर केवल वर्तमान क्षण में ही जीना चाहते हैं।
(4) बौद्धिकता एवं रूखापन, इस युग की कविताएँ हृदय की न होकर मस्तिष्क की देन हैं। इसलिए वे नीरस हैं और शायद चिरस्थायी साहित्य सम्पदा भी न हो। इन कविताओं में रागात्मकता के स्थान पर विचारात्मकता अधिक परिलक्षित होती है। इनका दावा है कि भले ही ये कविताएँ हृदय पर प्रभाव न डालें,किन्तु बौद्धिकता में भी रस होता है।
(5) साधारण विषयों पर लेखन इन नये कवियों ने आस – पास की साधारण वस्तुओं, जैसे – चूड़ी का टुकड़ा, चाय की प्याली, साइकिल, कुत्ता, होटल, दाल, नोन, तेल,लकड़ी, ब्लेड आदि को लेकर कविताएँ रची हैं।
(6) व्यंग्य एवं कटूक्ति – आधुनिक जीवन के विभिन्न पहलुओं पर व्यंग्य किये हैं। पर उनमें गम्भीरता का अभाव है। अतः वे व्यंग्य कटूक्ति बनकर रह गये।
(7) असम्बद्ध प्रलाप – फ्राइडवादी प्रवृत्ति के अनुसार उद्गारों का प्रभाव ग्रहण कर उन्मुक्त साहचर्य की पद्धति अपनाकर नयी कविता में उसका प्रयोग किया गया है।
(8) शैली – नये बिम्ब, प्रतिमान, उपमान, मुक्त छन्द और नयी शब्दावली का प्रयोग, बेढंगी उपमाओं, अनगढ़ शब्दों, असम्बद्ध पदों और अनुपयुक्त विशेषणों का प्रयोग किया है।

  • प्रयोगवाद के प्रमुख कवि एवं उनकी रचनाएँ

सन् 1943 में अज्ञेय ने ‘तार सप्तक’ का सम्पादन किया,फिर 1951 में दूसरा सप्तक’ और 1959 में ‘तीसरा सप्तक’ का सम्पादन किया।

1. प्रथम तार – सप्तक
(1) अज्ञेय,
(2) नैमिचन्द्र जैन,
(3) गजानन माधव मुक्तिबोध’,
(4) भारत भूषण,
(5) प्रभाकर माचवे,
(6) गिरिजाकुमार माथुर, और
(7) रामविलास शर्मा।

2. दूसरा तार – सप्तक
(1) भवानीप्रसाद मिश्र,
(2) धर्मवीर भारती,
(3) शकुन्तला माथुर,
(4) हरिनारायण व्यास,
(5) रघुवीर सहाय,
(6) शमशेर बहादुर सिंह, और
(7) नरेश मेहता।

3. तीसरा तार – सप्तक
(1) प्रयागनारायण त्रिपाठी,
(2) कीर्ति चौधरी,
(3) मदन वात्स्यायन,
(4) केदारनाथसिंह,
(5) कुँवरनारायण,
(6) विजयदेव नारायण साही, और
(7) सर्वेश्वर दयाल सक्सेना।

नलिनविलोचन शर्मा,डॉ. जगदीश गुप्त,श्रीकान्त वर्मा, अशोक वाजपेयी, धूमिल स्नेहमयी चौधरी, कैलाश वाजपेयी आदि भी प्रयोगवाद के अन्य प्रसिद्ध कवि हैं।
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5. नई कविता
[1950 से अब तक]

नई कविता भारतीय स्वाधीनता के अनन्तर लिखी गई उन कविताओं को कहा गया जिन्होंने नये भावबोध,नये मूल्यों और नूतन शिल्पविधान को अन्वेषित तथा स्थापित किया। नई कविता अपनी वस्तु – छवि तथा रूपायन में पूर्ववर्ती प्रगतिवाद तथा प्रयोगवाद की विकासान्विति होकर भी अपने में सर्वथा विशिष्ट तथा असामान्य है।

नई कविता में आज की क्षणवादी,लघु मानववादी जीवन दृष्टि के प्रति नकार निषेध नहीं अपितु स्वीकार सहमति के साथ जीवन को पूर्णतया स्वीकार करके उसके भोगने की आकांक्षा है। नई कविता क्षणों की अनुभूतियों में अपनी आस्था प्रकट करती है जो कि समस्त जीवनानुभूतियों के लिए अवरोध न बनकर सहायक होते हैं। नई कविता, लघु मानवत्व को स्वीकार करती है जिसका तात्पर्य है सामान्य मनुष्य की अपेक्षित समूची संवेदनाओं और मानसिकता की खोज या प्रतिष्ठा करना। नई कविता कोई वाद नहीं है। उसमें सर्व महान् विशिष्ट कश्य की व्यापकता तथा सृष्टि की उन्मुक्तता है। नई कविता के दो प्रमुख घटक हैं – (क) अनुभूति की सच्चाई और (ख) बुद्धि की यथार्थवादी दृष्टि।।

नई कविता जीवन के प्रत्येक क्षण को सत्य मानती है। आन्तरिक और मार्मिकता के कारण नई कविता में जीवन के अति साधारण सन्दर्भ अथवा क्रिया – कलाप नूतन अर्थ तथा छवि पा लेते हैं। नई कविता में क्षणों की अनुभूति को लेकर अनेकानेक मार्मिक एवं विचारोत्तेजक कविताएँ लिखी गई हैं जो कि अपने लघु आकार के बावजूद प्रभावोत्पादकता में अत्यन्त तीव्र तथा सघन हैं। नई कविता की वाणी अपने परिवेश की जीवनानुभूतियों से संसिक्त है।

  • नई कविता की प्रमुख प्रवृत्तियाँ

(1) कुंठा, संत्रास, मृत्युबोध – मानव मन में व्याप्त कुंठाओं का, जीवन के संत्रास एवं मृत्युबोध का मनोवैज्ञानिक ढंग से चित्रण इस काल की कविताओं की पहचान है।
(2) बिम्ब – प्रयोगवादी कवियों ने नूतन बिम्बों की खोज की है।
(3) व्यंग्य प्रधान रचनाएँ – इस काल में मानव जीवन की विसंगतियों, विकृतियों एवं अनैतिकतावादी मान्यताओं पर व्यंग्य रचनाएँ लिखी गई हैं।
(4) लघु मानववाद की प्रतिष्ठा – मानव जीवन को महत्वपूर्ण मानकर उसे अर्थपूर्ण दृष्टि प्रदान की गई।
(5) प्रयोगों में नवीनता – नए – नए भावों को नए – नए शिल्प विधानों में प्रस्तुत किया गया
(6) क्षणवाद को महत्व जीवन के प्रत्येक क्षण को महत्वपूर्ण मानकर जीवन की एक – एक अनुभूति को कविता में स्थान प्रदान किया गया है।
(7) अनुभूतियों का वास्तविक चित्रण – मानव व समाज दोनों की अनुभूतियों का सच्चाई के साथ चित्रण किया गया है।

नई कविता में जीवन मूल्यों की पुनः परीक्षा की गई है। प्रगतिवाद में लोक जीवन एक आन्दोलन के रूप में आया,प्रयोगवाद में वह कट गया परन्तु सम्प्रक्ति नई कविता की एक प्रमुख विशेषता बन गई। नई कविता के शिल्प को भी लोक – जीवन ने प्रभावित किया। उसने लोक – जीवन से बिम्बों,प्रतीकों,शब्दों तथा उपमानों को चुनकर निजी संवेदनाओं तथा सजीवता को द्विगुणित किया। नई कविता अपनी अन्तर्लय, बिम्बात्मकता, नव प्रतीक योजना, नये विशेषणों के प्रयोग,नव उपमान – संघटना के कारण प्रयोगवाद से अपना पृथक् अस्तित्व भी सिद्ध करती है।

प्रयोगवाद बोझिल शब्दावली को लेकर चलता है, परन्तु नई कविता ने प्रगतिवाद की तरह विशेष क्षेत्रों के विशिष्ट सन्दर्भ के लिए ही लोक शब्द नहीं लिये, परन्तु समस्त प्रकार के प्रसंगों के लिए लोक शब्दों का चयन किया। नई कविता की भाषा में एक खुलापन और ताजगी है।

निष्कर्षतः नई कविता मानव मूल्यों एवं संवेदनाओं की नूतन तलाश की कविता है।

  • नई कविता के प्रमुख कवि एवं उनकी रचनाएँ

नई कविता के प्रमुख कवियों में अज्ञेयजी के अनुभव – क्षेत्र तथा परिवेश में ग्राम एवं नगर, दोनों ही समाहित हैं। शहरी परिवेश के साथ जुड़ने वाले रचनाकारों में बालकृष्ण राव, शमशेर बहादुर सिंह, गिरिजाकुमार माथुर, कुँवर नारायण, डॉ. धर्मवीर भारती, डॉ. प्रभाकर माचवे, विजयदेव नारायण साही, रघुवीर सहाय आदि कवि आते हैं परन्तु भवानीप्रसाद मिश्र, केदारनाथ सिंह, शम्भूनाथ सिंह, ठाकुर प्रसाद सिंह, नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल आदि ऐसे सृजनकर्ता हैं जिन्होंने मुख्यतः ग्रामीण संस्कारों को अभिव्यक्ति दी।
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प्रश्नोत्तर

(क) वस्तुनिष्ठ प्रश्न

  • बहु – विकल्पीय

प्रश्न 1. आधुनिक हिन्दी कविता का प्रारम्भ माना जाता है
(अ) 1901 ई.से, (ब) 1900 ई.से, (स) संवत् 1901 से, (द) संवत् 1900 से।

2. छायावादी युग की कालावधि है
(अ) 920 – 1936, (ब) 1936 – 1943, (स) 1943 – 1950, (द) 1950 – अब तक।

3. छायावादी काव्य की विशेषता है [2009]
(अ) सामाजिक यथार्थ का चित्रण, (ब) अलौकिक सत्ता के प्रति प्रेम, विद्रोह, (स) सुख के लिए फूल तथा दुःख के लिए काँटा, (द) रूढ़ियों के प्रति विद्रोह।

4. नई कविता की कालावधि है
(अ) 1920 – 1936, (ब) 1936 – 1943, (स) 1943 – 1950, (द) 1950 – अब तक।

5. हिन्दी कविता का जागरण काल माना जाता है
(अ) भारतेन्दु युग को, (ब) द्विवेदी युग को, (स) छायावादी युग को, (द) प्रयोगवादी युग को।

6. इस युग के काव्य में सामाजिक तथा पौराणिक विषयों का विस्तार हुआ
(अ) भारतेन्दु युग, (ब) द्विवेदी युग, (स) छायावादी युग, (द) रहस्यवादी युग।

7. “स्थूल के प्रति सूक्ष्म का विद्रोह” – छायावाद की यह परिभाषा है
(अ) आचार्य रामचन्द्र शुक्ल की, (ब) डॉ.रामकुमार वर्मा की, (स) डॉ.नगेन्द्र की, (द) आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी की।

8. प्रसाद, पन्त, निराला और महादेवी को इस युग के चार स्तम्भ माना गया है
(अ) प्रगतिवाद, (ब) छायावाद, (स) प्रयोगवाद, (द) नई कविता।

9. ‘युगधारा’ के रचनाकार हैं
(अ) नागार्जुन, (ब) सुमित्रानन्दन पन्त, (स) त्रिलोचन, (द) निराला।

10. दूसरा तार – सप्तक प्रकाशित हुआ
(अ) 1943 में, . (ब) 1950 में, (स) 1951 में, (द) 1959 में।

11. नई कविता की प्रमुख प्रवृत्ति है
(अ) बिम्ब, (ब) प्रयोगों में नवीनता, (स) व्यंग्य प्रधान रचनाएँ, (द) उपर्युक्त सभी।

12. ‘कामायनी’ इस युग की रचना है [2009]
(अ) रहस्यवाद, (ब) प्रयोगवाद, (स) छायावाद, (द) प्रगतिवाद।
उत्तर–
1. (द), 2. (अ), 3. (ब), 4. (द), 5. (अ), 6. (ब), 7.(स), 8. (ब), 9.(अ), 10. (स), 11. (द), 12. (स)।

  • रिक्त स्थानों की पूर्ति

1. नई कविता की कालावधि …… से अब तक मानी गई है।
2. ‘पंचवटी’ के रचनाकार ……. थे।
3. हिन्दी कविता में आधुनिकता तथा नवीन युग के सूत्रपात का श्रेय ……. युग को प्रदान किया जाता है।
4. ‘नीरजा’ की रचनाकार ……… हैं।
5. “चिन्तन के क्षेत्र में जो अद्वैतवाद है,वही भावना के क्षेत्र में ……. है।”
6. प्रथम तार – सप्तक का प्रकाशन ……. में हुआ।
7. ‘सन्नाटा’ के रचनाकार “…” हैं।
8. ……. मानव मूल्यों और संवेदनाओं की कविता है।
9. ……… कविता पर मार्क्सवाद का प्रभाव है।
10. राजनीति के क्षेत्र में जो साम्यवाद है, वह काव्य के क्षेत्र में ……. है।
11. प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना ……….. में हुई। [2009]
12. ……… स्थूल के प्रति सूक्ष्म का विद्रोह है। [2009]
13. शोषण का विरोध ………. काव्य की प्रमुख विशेषता है। [2009]
14. जयशंकर प्रसाद ……. के प्रमुख कवि हैं। [2010]
15. सुमित्रानन्दन पन्त …… के प्रमुख कवि हैं। [2011]
उत्तर–
1. 1950 ई, 2. मैथिलीशरण गुप्त, 3. छायावादी, 4. महादेवी वर्मा, 5. रहस्यवाद, 6. 1943 ई. 7. भवानीप्रसाद मिश्र, 8. नई कविता, 9. प्रगतिवादी 10. प्रगतिवाद, 11. सन् 1936, 12. छायावाद, 13. प्रगतिवादी, 14. छायावाद, 15. छायावाद।

  • सत्य/असत्य

1. आधुनिक हिन्दी कविता का प्रारम्भ 1900 ई.से माना गया है।
2. आधुनिक काल की कविता में धर्म,दर्शन,कला एवं साहित्य के प्रति नवीन दृष्टिकोण का आविर्भाव हुआ।
3. प्रयोगवादी युग की कालावधि 1943 ई.से 1950 ई. तक मानी गयी है।
4. द्विवेदी युग को हिन्दी साहित्य का प्रवेश – द्वार माना जाता है।
5. प्रसाद,पन्त, निराला और महादेवी वर्मा रहस्यवाद के चार प्रमुख स्तम्भ माने गये हैं।
6. “प्रकृति में सूक्ष्म सत्ता का दर्शन ही रहस्यवाद है।” यह कथन मुकुटधर पांडेय का है।
7. “राजनीति के क्षेत्र में जो साम्यवाद है,वह काव्य के क्षेत्र में प्रगतिवाद है।”
8. “ये कवि नवीन राहों के अन्वेषी हैं।” प्रयोगवाद के सम्बन्ध में यह कथन अज्ञेयजी का है।
9. गजानन माधव मुक्तिबोध रीतिकाल के प्रमुख कवि हैं। [2010]
10. भक्तिकाल को हिन्दी साहित्य का स्वर्ण युग कहा जाता है। [2009]
उत्तर–
1. असत्य, 2. सत्य, 3. सत्य, 4. असत्य, 5. असत्य, 6. सत्य, 7. सत्य, 8. सत्य, 9. असत्य,10. सत्य।

  • सही जोड़ी मिलाइये

I. ‘क’
(1) माखनलाल चतुर्वेदी – (अ) कामायनी
(2) केदारनाथ अग्रवाल – (ब) सूर्य का स्वागत
(3) जयशंकर प्रसाद – (स) हिमकिरीटिनी
(4) धर्मवीर भारती – (द) फूल नहीं रंग बोलते हैं
(5) दुष्यन्त कुमार – (इ) अन्धा युग
उत्तर–
(1) → (स),
(2) → (द),
(3) → (अ),
(4) → (इ),
(5) → (ब)।

II. ‘क’
(1) छायावाद – (अ) सुमित्रानन्दन पन्त
(2) हिन्दी साहित्य का प्रवेश द्वार [2010] – (ब) जयशंकर प्रसाद
(3) प्रकृति के सुकुमार कवि [2011] – (स) नई कविता
(4) प्रयोगवाद – (द) अज्ञेय
(5) व्यंग्य की प्रधानता [2009] – (इ) भारतेन्दु युग
उत्तर–
(1) → (ब),
(2) → (इ),
(3) → (अ),
(4) → (द),
(5) → (स)।

  • एक शब्द/वाक्य में उत्तर

प्रश्न 1.
भारतेन्दु युग के कवियों की वाणी में कौन – सा स्वर मुखरित हुआ है?
उत्तर–
राष्ट्रीयता का स्वर।

प्रश्न 2.
द्विवेदी युग में कौन – सी भाषा कविता की संवाहिका बनी?
उत्तर–
खड़ी बोली।

प्रश्न 3.
हिन्दी कविता में नवीन युग के सूत्रपात का श्रेय किस युग को प्रदान किया जाता है?
उत्तर–
छायावादी युग।

प्रश्न 4.
छायावादी काव्य में किन भावनाओं की प्रधानता है?
उत्तर–
सौन्दर्य तथा प्रेम – भावना।

प्रश्न 5.
महादेवी वर्मा के काव्य में प्रधान रूप से कौन – से स्वर मुखरित हैं?
उत्तर–
विरह – वेदना।

प्रश्न 6.
जयशंकर प्रसाद ने मूलत: अपने काव्य में किन भावों का अंकन किया है?
उत्तर–
सौन्दर्य,प्रेम, यौवन और श्रृंगार।

प्रश्न 7.
छायावादी युग के किस कवि ने क्रान्ति एवं विद्रोह का स्वर निनादित किया है?
उत्तर–
सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’।

प्रश्न 8.
कामायनी किस युग की रचना है?
उत्तर–
आधुनिक छायावादी युग।

प्रश्न 9.
गजानन माधव मुक्तिबोध’ की रचनाएँ किस युग से सम्बन्धित हैं?
उत्तर–
प्रगतिवाद।

प्रश्न 10.
यथार्थ से पलायन का काव्य कौन – सा है?
उत्तर–
छायावाद।

  • (ख) अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
प्रगतिवादी साहित्य किस विचारधारा से प्रभावित है?
उत्तर–
प्रगतिवादी साहित्य साम्यवादी विचारधारा से प्रभावित है।

प्रश्न 2.
दो छायावादी कवियों के नाम बताइये।
उत्तर–
(1) सुमित्रानन्दन पन्त,
(2) महादेवी वर्मा।

प्रश्न 3.
सुमित्रानन्दन पन्त किन – किन विचारधाराओं से प्रभावित थे?
उत्तर–
सुमित्रानन्दन पन्त गाँधीवाद,मार्क्सवाद एवं अरविन्द दर्शन से अत्यधिक प्रभावित

प्रश्न 4.
भारतेन्दु युग का अन्य क्या नाम है?
उत्तर–
भारतेन्दु युग को ‘पुनर्जागरण काल’ के नाम से भी जाना जाता है।

प्रश्न 5.
भारतेन्दु युग में काव्य की भाषा क्या थी?
उत्तर–
भारतेन्दु युग में काव्य की भाषा ब्रज थी।

प्रश्न 6.
आधुनिक काल के द्वितीय युग का नाम लिखिए।
उत्तर–
आधुनिक काल के द्वितीय युग का नाम द्विवेदी युग है।

प्रश्न 7.
द्विवेदी युग के प्रवर्तक कौन थे?
उत्तर–
द्विवेदी युग के प्रवर्तक आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी माने जाते हैं।

प्रश्न 8.
द्विवेदीयुगीन दो महाकाव्यों के नाम लिखिए।
उत्तर–
द्विवेदीयुगीन दो महाकाव्य ‘प्रिय प्रवास’ और ‘साकेत’ हैं।

प्रश्न 9.
छायावाद का तात्पर्य समझाइए।
उत्तर–
संसार के किसी पदार्थ में एक अनजान शक्ति का प्रतिबिम्ब निहारना अथवा सको आरोपित करना छायावाद कहलाता है।

प्रश्न 10.
छायावादी काव्य के एक कवि एवं उसकी एक रचना का नाम बताइए।
उत्तर–
एक प्रमुख छायावादी कवि सुमित्रानन्दन पन्त हैं एवं उनकी रचना लोकायतन’ है।

प्रश्न 11.
छायावाद का समय क्या माना गया है?
उत्तर–
छायावाद का समय सन् 1920 ई.से 1936 ई. माना गया है।

प्रश्न 12.
छायावाद की किन्हीं दो रचनाओं के नाम लिखिए।
उत्तर–
‘कामायनी’ तथा ‘परिमल’ छायावाद की प्रमुख दो रचनाएँ हैं।

प्रश्न 13.
छायावादी युग के दो श्रेष्ठ कवियों के नाम लिखिए।
उत्तर–
जयशंकर प्रसाद एवं सुमित्रानन्दन पन्त छायावाद के दो श्रेष्ठ कवि हैं।

प्रश्न 14.
प्रगतिवादी कविता का विषय क्या रहा है?
उत्तर–
प्रगतिवादी कविता में निर्धन, मजदूरों तथा शोषितों का यथार्थ चित्रण हु

प्रश्न 15.
प्रगतिवादी काव्य की समयावधि का उल्लेख कीजिए।
उत्तर–
प्रगतिवादी काव्य का समय सन् 1936 से लेकर 1943 तक स्वीकारा गया है।

प्रश्न 16.
प्रगतिवादी काव्यधारा के दो कवियों के नाम लिखिए।
उत्तर–
प्रगतिवादी काव्यधारा के दो श्रेष्ठ कवि नागार्जुन तथा केदारनाथ अग्रवाल हैं।

प्रश्न 17.
प्रयोगवाद का प्रवर्तक किसे माना गया है?
उत्तर–
प्रयोगवाद का प्रवर्तक ‘अज्ञेय’ को माना गया है।

प्रश्न 18.
‘तार सप्तक’ का सम्पादन प्रथम बार कब और किसने किया?
उत्तर–
तार सप्तक’का प्रथम बार सम्पादन ‘अज्ञेय’ जी ने सन् 1943 में किया था।

प्रश्न 19.
प्रयोगवाद के एक कवि तथा उसकी एक रचना का नाम लिखिए।
उत्तर–
अज्ञेय’ प्रयोगवाद के प्रमुख कवि हैं। उनकी एक रचना का नाम ‘बावरा अहेरी’ है।

प्रश्न 20.
‘नई कविता’ के एक कवि तथा उसकी एक रचना का नाम लिखिए।
उत्तर–
नई कविता’ के प्रमुख कवि भवानीप्रसाद मिश्र हैं तथा उनकी एक रचना का नाम ‘गीत फरोश’ है।

  • (ग) लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
हिन्दी कविता के आधुनिक विकासक्रम को विद्वानों ने किस प्रकार वर्गीकृत किया है? सर्वमान्य रूपों को लिखिए तथा यह भी बताइए कि हिन्दी साहित्य का प्रवेश द्वार किस युग को माना गया है? [2009]
उत्तर–
आधुनिक हिन्दी कविता के विकासक्रम को विभिन्न विद्वानों ने अनेक प्रकार से वर्गीकृत किया है किन्तु सर्वमान्य रूप से इस विकास को अग्रलिखित भागों में बाँटा जा सकता है-
MP Board Class 12th Special Hindi पद्य साहित्य का विकास आधुनिक काव्य प्रवृत्तियाँ img-8

भारतेन्दु युग हिन्दी कविता का जागरण काल है। इस युग को हिन्दी साहित्य का प्रवेश द्वार माना जाता है। इस युग में देशोद्धार, राष्ट्र – प्रेम, अतीत – गरिमा आदि विषयों की ओर ध्यान दिया गया और कवियों की वाणी में राष्ट्रीयता का स्वर निनादित होने लगा।

प्रश्न 2.
आधुनिक काल को कितने युगों में विभाजित किया गया है?
उत्तर–
आधुनिक काल को निम्नांकितं युगों में विभाजित किया गया है
(1) भारतेन्दु युग,
(2) द्विवेदी युग,
(3) छायावादी युग,
(4) प्रगतिवादी युग,
(5) प्रयोगवादी युग,
(6) नयी कविता।

प्रश्न 3.
भारतेन्दु युग के काव्य की प्रमुख विशेषताएँ लिखिए। [2015, 16]
उत्तर–
भारतेन्दु युग के काव्य की प्रमुख विशेषताएँ इस प्रकार हैं
(1) समाज सुधार का भाव,
(2) राष्ट्रीय चेतना,
(3) भक्ति भावना,
(4) प्रकृति चित्रण,
(5) ब्रजभाषा का प्रयोग,
(6) शृंगार वर्णन,
(7) स्वदेश – प्रेम।

प्रश्न 4.
भारतेन्दु युग के प्रमुख कवियों के नाम लिखिए।
उत्तर–
भारतेन्द हरिश्चन्द्र प्रताप नारायण मिश्र चौधरी बद्रीनारायण ‘प्रेमघन’ ‘ठाकर जगमोहन सिंह’, राधाकृष्ण दास, अम्बिकादत्त व्यास आदि भारतेन्दु युग के प्रमुख कवि हैं।

प्रश्न 5.
भारतेन्दु युग को हिन्दी कविता का जागरण काल क्यों कहा जाता है?
उत्तर–
भारतेन्दु युग के कवियों की कविता में देशोद्धार, राष्ट्र – प्रेम, अतीत गरिमा आदि विषयों की ओर ध्यान दिया गया है। कवियों की वाणी में राष्ट्रीयता के स्वर मुखरित हैं। सांस्कृतिक,राजनीतिक एवं सामाजिक आन्दोलनों के फलस्वरूप हिन्दी काव्य में नयी चेतना तथा विचारों का समावेश हुआ।

प्रश्न 6.
द्विवेदी – युग के काव्य की चार विशेषताएँ बताइए। [2006]
उत्तर–
(1) वर्णन का प्राधान्य,
(2) अतीत के गौरव का बखान,
(3) आदर्शवादिता, और
(4) देश – प्रेम।

प्रश्न 7.
रूपसि तेरा घन केशपाश !
श्यामल – श्यामल कोमल – कोमल
लहराता सुरभित केशपाश !
उपर्युक्त में व्यक्त छायावाद की तीन विशेषताएँ बताइए।
उत्तर–
(1) सौन्दर्य का चित्रण,
(2) मानवीकरण,
(3) कोमलकान्त पदावली।

प्रश्न 8.
छायावाद के तीन कवियों के नाम उनकी एक – एक रचना सहित लिखिए।
उत्तर–
(1) जयशंकर प्रसाद कामायनी।
(2) सुमित्रानन्दन पन्त – युगवाणी।
(3) महादेवी वर्मा – दीपशिखा।

प्रश्न 9.
छायावादी कविता की विशेषताओं का उल्लेख कीजिए। [2009]
अथवा
छायावाद की चार विशेषताएँ लिखिए। [2012, 14, 17]
उत्तर–
(1) सौन्दर्य तथा प्रणय – भावनाओं का प्राधान्य।
(2) भाषा में लाक्षणिकता तथा वक्रता की प्रमुखता।
(3) बाह्यार्थ निरूपण के स्थान पर स्वानुभूति निरूपण की प्रमुखता।
(4) प्रकृति का सजीव सत्य के रूप में चित्रण तथा प्रकृति पर कवि द्वारा अपने भावों का आरोपण।
(5) छन्द विधान में नूतनता।।
(6) डॉ. नगेन्द्र के शब्दों में, छायावाद स्थूल के प्रति सूक्ष्म का विद्रोह था।”

प्रश्न 10.
छायावाद के चार प्रमुख कवियों के नाम बताइए।
उत्तर–
छायावाद के चार प्रमुख कवि –
(1) जयशंकर प्रसाद,
(2) सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’,
(3) सुमित्रानन्दन पन्त, तथा
(4) महादेवी वर्मा हैं।

प्रश्न 11.
छायावादी कविता के ह्रास के प्रमुख कारण लिखिए।
उत्तर–
छायावादी कविता में प्रेम और सौन्दर्य का अति सूक्ष्म अंकन हो रहा था। काव्य में यथार्थ से परे रहस्यवादी प्रवृत्तियों की प्रधानता का समावेश हो गया था। जीवन से पलायन की प्रवृत्ति बढ़ गयी थी। प्रतीक और बिम्बों की अतिशयता थी। ये कारण ही छायावाद के हास के कारण बने।

प्रश्न 12.
रहस्यवाद की परिभाषा देते हुए रहस्यवादी कविता की चार विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
अथवा
रहस्यवादी कविता की विशेषताएँ लिखिए। [2009, 15]
उत्तर–
परिभाषा – आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के शब्दों में, “चिन्तन के क्षेत्र में जो अद्वैतवाद है वही भावना के क्षेत्र में रहस्यवाद है।”
विशेषताएँ –
(1) विरह – वेदना की अभिव्यक्ति।
(2) आधुनिक काल में रहस्यवादी कविता व्यापक स्वच्छन्दतावादी काव्य क्षेत्र के अन्तर्गत समाविष्ट है।
(3) कविता में अप्रस्तुत योजना की नतनता है।
(4) रहस्यवादी कविता में बौद्ध दर्शन के अतिरिक्त उपनिषदों का प्रभाव भी परिलक्षित है।

प्रश्न 13.
छायावाद तथा रहस्यवाद में अन्तर लिखिए। [2010]
उत्तर–
छायावाद तथा रहस्यवाद में अन्तर इस प्रकार है-
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प्रश्न 14.
प्रगतिवादी काव्य का परिचय दीजिए।
उत्तर–
अतिशय भावुकता का विरोध,स्थूल भौतिक जगत की यथार्थता का वर्णन,शोषण के प्रति आक्रोश तथा सामाजिक विषमताओं पर तीव्र प्रहार करने की प्रवृत्ति वाले हिन्दी काव्य को प्रगतिवादी काव्य कहा जाता है।

प्रश्न 15.
पाँच प्रगतिवादी कवियों के नाम बताइए।
उत्तर–
पाँच प्रगतिवादी कवि हैं –
(1) नागार्जुन,
(2) रामधारी सिंह ‘दिनकर’,
(3) नागार्जुन,
(4) शिवमंगल सिंह ‘सुमन’,
(5) निराला।

प्रश्न 16.
दो प्रगतिवादी कवियों के नाम लिखिए तथा उनकी एक – एक रचना का नाम भी लिखिए।
अथवा
प्रगतिवाद की विशेषताएँ बताते हुए दो प्रमुख कवियों के नाम तथा उनकी एक – एक रचना लिखिए। [2009, 11, 13]
उत्तर–
प्रगतिवाद की विशेषताएँ –
(1) प्रगतिवादी काव्य में यथार्थ का चित्रण है।
(2) इस काव्य में रूढ़िवादी विचारधाराओं का जमकर विरोध किया गया है।
(3) मानव की समानता में आस्था।
MP Board Class 12th Special Hindi पद्य साहित्य का विकास आधुनिक काव्य प्रवृत्तियाँ img-10

प्रश्न 17.
प्रगतिवाद की चार विशेषताएँ लिखिए। [2017]
उत्तर–
प्रगतिवादी काव्य की चार विशेषताएँ निम्नांकित हैं-
(1) सड़ी – गली रूढ़ियों का विरोध।
(2) शोषण तथा अन्याय के प्रति रोष।
(3) साम्यवाद से प्रभावित।
(4) मानव की समानता में आस्था।

प्रश्न 18.
प्रगतिवादी काव्यधारा से आप क्या समझते हैं? दो प्रगतिवादी कवियों के नाम लिखिए। [2009]
उत्तर–
प्रगति शब्द का अर्थ है – चलना, आगे बढ़ना। अर्थात् यह वह वाद है जो आगे बढ़ने में विश्वास रखता है। प्रगतिवाद में साम्यवादी दृष्टिकोण को साहित्यिक विचारधारा के रूप में स्वीकार किया गया है। प्रगतिवादी काव्य की संज्ञा उस कविता को प्रदान की गई है जो कि छायावाद के समापन काल में सन् 1936 के आस – पास सामाजिक चेतना को लेकर अग्रसर हुआ। प्रगतिवादी कविता में राजनैतिक, आर्थिक और सामाजिक शोषण से मुक्ति का स्वर प्रमुख है। इस कविता पर मार्क्सवाद का प्रभाव है।

दो प्रगतिवादी कवि हैं – सुमित्रानन्दन पन्त, नागार्जुन।

प्रश्न 19.
कुछ प्रमुख महाकाव्यों एवं उनके रचयिता का नाम लिखिए।
उत्तर–
MP Board Class 12th Special Hindi पद्य साहित्य का विकास आधुनिक काव्य प्रवृत्तियाँ img-11

प्रश्न 20.
‘तार सप्तक’ से क्या आशय है? समझाइए।
उत्तर–
सन् 1943 ई.में प्रथम बार तार सप्तक’ के प्रकाशन के साथ हिन्दी में प्रयोगवाद का आरम्भ हुआ। यही धारा विकसित होकर 1952 – 54 तक ‘नयी कविता के रूप में स्थापित हो गयी। आज इसी का युग चल रहा है। इसकी मुख्य विशेषताएँ ये हैं – अतिवैयक्तिकता. यथार्थवाद, बौद्धिकता का आग्रह, विद्रोह का स्वर, यौन भावनाओं का मुक्त चित्रण, सामाजिक विषमता पर व्यंग्य विचित्रता का प्रदर्शन प्रकृति का बहुविधि चित्रण,भावों और भाषा का अनगढ़ रूप,भदेसपन,प्रतीकात्मकता, नवीन उपमान तथा भाषा शैली के नये प्रयोग।

प्रश्न 21.
प्रयोगवादी कविता की विशेषताएँ लिखिए। [2009]
अथवा
प्रयोगवाद की विशेषताएँ बताते हुए दो प्रयोगवादी कवियों के नाम लिखिए। [2012]
अथवा
प्रयोगवादी काव्य की तीन प्रमुख विशेषताओं का उल्लेख दो प्रमुख कवियों के नाम, उनकी एक – एक रचना के साथ लिखिए। [2013]
उत्तर–
प्रयोगवाद की विशेषताएँ –
(1) प्रयोगवादी कविता पर मार्क्सवादी प्रभाव परिलक्षित है।
(2) इस काव्य में सजग एवं गहरी पीड़ा का बोध है।
(3) प्रयोगवादी कविता भावुकता के स्थान पर बौद्धिकता पर विशेष बल देती है।
(4) फ्रायड के काम सिद्धान्त को सर्वोपरि रूप में स्वीकार किया गया है।
MP Board Class 12th Special Hindi पद्य साहित्य का विकास आधुनिक काव्य प्रवृत्तियाँ img-12

प्रश्न 22.
‘प्रयोगवाद’ का प्रारम्भ काल बताइए तथा उसकी प्रमुख प्रवृत्ति का उल्लेख कीजिए।
उत्तर–
‘अज्ञेय’ के सम्पादन में प्रकाशित ‘तार सप्तक’ के साथ सन् 1943 ई. से ‘प्रयोगवाद’ का प्रारम्भ माना गया है। प्रयोग के प्रति आग्रह इस कविता की प्रमुख प्रवृत्ति है।

प्रश्न 23.
प्रयोगवादी कवियों का नाम उल्लेख करते हुए उनकी प्रमुख वृत्तियों को संक्षेप में बताइए।
उत्तर–
प्रयोगवाद के प्रमुख कवि अज्ञेय, धर्मवीर भारती, भारत भूषण, नरेश मेहता, प्रभाकर माचवे आदि हैं। उनके काव्य में अतिवैयक्तिकता, बौद्धिकता, यथार्थवादिता,स्वार्थपन, विद्रोह,नग्न श्रृंगार, भदेसपन आदि वृत्तियाँ दृष्टिगोचर होती हैं। इन कवियों ने प्राचीन का विरोध किया है। भाषा तथा शैली का अनगढ़ विकृत रूप भी इनके काव्य में दिखायी पड़ता है।

प्रश्न 24.
प्रयोगवादी और प्रगतिवादी काव्य में कोई तीन अन्तर लिखिए।
उत्तर–
प्रयोगवादी काव्य में कवि प्रतीक, बिम्ब,शब्द चयन और कथन की विचित्र भाव भंगिमा द्वारा मानव मन की कुंठा की अभिव्यक्ति होती है। इस काव्य में घोर व्यक्तिवाद होता है और इसमें निराशावादी दृष्टिकोण पाया जाता है जबकि प्रगतिवाद पूँजीपति वर्ग के प्रति घृणा व्यक्त करता है,शोषित वर्ग की दीन – हीन दशा का वर्णन करता है और नारी के प्रति यथार्थवादी दृष्टिकोण का चित्रण करता है।

प्रश्न 25.
नई कविता की चार विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर–
(1) नई कविता जीवन के हर क्षण को सत्य ठहराती है।
(2) नई कविता की को वाणी अपने परिवेश के जीवन अनुभव पर आधारित है।
(3) नई कविता लघु माननत्व को स्वीकार करती है।
(4) नई कविता में जीवन मूल्यों की पुनः परीक्षा की गयी है।

प्रश्न 26.
नई कविता एवं प्रयोगवादी कविता में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर–
नई कविता ने प्रगतिवाद की तरह विशेष क्षेत्रों में विशिष्ट शब्द नहीं लिए हैं। समस्त प्रकार के प्रश्नों हेतु लोक शब्दों का चयन किया है। प्रयोगवाद बोझिल शब्दावली को लेकर चलता है। प्रयोगवादी कविता में मध्यवर्गीय जीवन के संघर्ष को बौद्धिकता के माध्यम से अभिव्यक्त किया गया है।

प्रश्न 27.
यह पहाड़ी, पाँव क्या चढ़ते इरादों ने चढ़ी है,
कल दरीजे ही बनेंगे द्वार,
अब तो पथ यही है।
उपर्युक्त पंक्तियों को किन कारणों से नयी कविता कहा जा सकता है?
उत्तर–
नयी कविता में भाषा की सरलता, बिम्बात्मकता और प्रतीक योजना होती है। क्षण की अनुभूति को कविता का आकार दिया जाता है। इन पंक्तियों में नयी कविता की ये विशेषताएँ हैं। इसलिए इनको नयी कविता कहा जा सकता है।

प्रश्न 28.
‘नई कविता’ के प्रमुख कवियों तथा उनकी प्रमुख रचनाओं के नाम लिखिए।
उत्तर–
नई कविता’ के प्रमुख कवि एवं उनकी प्रमुख रचनाएँ इस प्रकार हैं-
MP Board Class 12th Special Hindi पद्य साहित्य का विकास आधुनिक काव्य प्रवृत्तियाँ img-13

प्रश्न 29.
‘नई कविता’ की दो विशेषताएँ बताते हुए दो प्रमुख कवियों के नाम तथा उनकी एक – एक रचना का नाम लिखिए। [2010]
अथवा
नई कविता की तीन विशेषताएँ बताते हुए दो प्रमुख कवियों के नाम लिखिए। [2014]
उत्तर–
नई कविता’ के प्रमुख कवि एवं उनकी प्रमुख रचनाएँ इस प्रकार हैं –
(1) नई कविता जीवन के हर क्षण को सत्य ठहराती है।
(2) नई कविता की को वाणी अपने परिवेश के जीवन अनुभव पर आधारित है।
(3) नई कविता लघु माननत्व को स्वीकार करती है।
(4) नई कविता में जीवन मूल्यों की पुनः परीक्षा की गयी है।

प्रश्न 30.
लोकगीतों की कोई दो विशेषताएँ लिखिए। [2012]
उत्तर–
लोकगीतों की प्रमुख विशेषताएँ निम्नवत् हैं
(1) लोकगीत अधिकांशतः सामूहिक रूप में ही माने जाते हैं।
(2) लोकगीत लोक मानस के भावों और विचारों को प्रकट करने की सक्षम विधा है।
(3) लोकगीतों में जीवन का उल्लास, विषाद, भक्तिभावना, हास्य – व्यंग्य, प्रेम, प्रकृति, आक्रोश आदि भावों का समावेश रहता है।
(4) लोकगीत सामाजिक परम्पराओं में भी बड़ी भूमिका निभाते हैं।

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